प्रशासन की लापरवाही पर उठे सवाल


चिरमिरी।
जिस लाहिड़ी स्कूल ने दशकों तक चिरमिरी की पीढ़ियों को शिक्षा की रोशनी दी, जहां से पढ़कर कई विद्यार्थी प्रशासनिक सेवाओं में पहुंचे और कई जनप्रतिनिधियों ने भी शिक्षा ग्रहण की, उसी ऐतिहासिक धरोहर का एक हिस्सा 17 अगस्त 2026 को ढह गया। घटना ने न केवल शहरवासियों को झकझोर दिया, बल्कि ऐतिहासिक शिक्षण संस्थाओं के संरक्षण को लेकर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
लाहिड़ी स्कूल चिरमिरी के इतिहास का महज एक विद्यालय नहीं, बल्कि शहर की शिक्षा और सामाजिक विकास की पहचान रहा है। स्वर्गीय विभूति भूषण लाहिड़ी, जिन्हें स्थानीय लोग स्नेह से ‘दादू लाहिड़ी’ के नाम से याद करते हैं, ने चिरमिरी में शिक्षा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्ष 1948 में प्राथमिक विद्यालय की स्थापना से शुरू हुई यह शिक्षा यात्रा आगे चलकर लाहिड़ी स्कूल के रूप में विकसित हुई और वर्ष 1953 में लाहिड़ी महाविद्यालय की स्थापना के साथ उच्च शिक्षा का भी आधार मजबूत हुआ।

जिस संस्था ने पीढ़ियां गढ़ीं, वही आज उपेक्षित
लाहिड़ी स्कूल की पहचान केवल उसकी पुरानी इमारत तक सीमित नहीं है। इस विद्यालय से पढ़कर निकले विद्यार्थियों ने शिक्षा, प्रशासन, राजनीति और समाज सेवा सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां अध्ययन करने वाले कई विद्यार्थी आगे चलकर आईएएस, आईपीएस अधिकारी और जनप्रतिनिधि बने।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस संस्था ने चिरमिरी की कई पीढ़ियों का भविष्य संवारा, उसकी ऐतिहासिक इमारत को सुरक्षित रखने के लिए समय रहते ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए?
17 अगस्त को ढह गई विरासत
17 अगस्त 2026 का दिन चिरमिरी के इतिहास में एक दुखद दिन के रूप में दर्ज हो गया। जर्जर हो चुकी लाहिड़ी स्कूल की ऐतिहासिक इमारत का हिस्सा ढह गया। वर्षों पुरानी इस इमारत की स्थिति को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही, लेकिन संरक्षण और मरम्मत के प्रभावी प्रयास नहीं होने के आरोप अब सामने आ रहे हैं।
इमारत का ढहना केवल भवन को नुकसान पहुंचना नहीं है, बल्कि शहर के इतिहास, स्मृतियों और शिक्षा की विरासत का कमजोर होना है।
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
शहरवासियों का कहना है कि यदि किसी ऐतिहासिक भवन की हालत लंबे समय से खराब थी, तो प्रशासन को इसकी तकनीकी जांच कराकर संरक्षण की योजना बनानी चाहिए थी। समय रहते मरम्मत, जीर्णोद्धार या संरचनात्मक संरक्षण किया जाता तो शायद इस स्थिति से बचा जा सकता था।
अब जब ऐतिहासिक इमारत का हिस्सा ढह चुका है, तो लोगों में यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या प्रशासन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर गंभीर है?
धरोहर बचाने की अब भी गुंजाइश
लाहिड़ी स्कूल से जुड़ी पुरानी तस्वीरें, दस्तावेज, भवन की वास्तुकला और यहां से शिक्षा प्राप्त कर देश-प्रदेश में पहचान बनाने वाले लोगों की स्मृतियां चिरमिरी की अमूल्य विरासत हैं। आवश्यकता है कि शेष ऐतिहासिक संरचना का तत्काल तकनीकी सर्वे कराया जाए और विशेषज्ञों की सलाह से उसका संरक्षण किया जाए।
साथ ही, लाहिड़ी स्कूल के इतिहास, यहां अध्ययन करने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों और विभूति भूषण लाहिड़ी के योगदान को संकलित कर एक स्थायी विरासत केंद्र या स्मृति संग्रहालय विकसित करने की पहल भी की जा सकती है।
शहर पूछ रहा है—जिम्मेदार कौन?
जिस धरोहर ने चिरमिरी को शिक्षित पीढ़ियां दीं, जिस संस्थान से निकलकर विद्यार्थियों ने प्रशासन और जनसेवा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई, उसी धरोहर का संरक्षण नहीं हो पाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
17 अगस्त को गिरी लाहिड़ी स्कूल की इमारत ने सिर्फ अपनी दीवारें नहीं खोईं—उसके साथ चिरमिरी ने अपने इतिहास का एक हिस्सा खो दिया।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस घटना को केवल एक जर्जर भवन के गिरने की घटना मानता है या इसे चिरमिरी की ऐतिहासिक विरासत को बचाने की चेतावनी के रूप में लेकर कोई ठोस कदम उठाता है।
विशेष रिपोर्ट | अभिजीत मुखर्जी संवाददाता









